2016-17 में संगठित क्षेत्रों मिलीं मात्र चार लाख नई नौकरियां

नई दिल्ली: देश के संगठित क्षेत्र ने वित्त वर्ष 2016-17 में हर दिन 11 सौ से कुछ ज्यादा नौकरियां दीं। इस तरह पूरे साल में कुल 4.16 लाख नई नौकरियां लोगों को मिलीं। यह आंकड़ा पिछले वित्त वर्ष 2015-16 से दो फीसदी ज्यादा है। 2016-17 की आखिरी तिमाही में पिछली तीन तिमाहियों के मुकाबले ज्यादा नई नौकरियां दी गईं। रोजगार परिदृश्य पर श्रम मंत्रालय की ओर से शुक्रवार को जारी तिमाही रिपोर्ट में यह आंकड़े पेश किए गए।

इस रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2016-17 में 45 फीसदी नई नौकरियां जनवरी से मार्च 2017 के बीच आईं, जबकि नोटबंदी का एलान आठ नवंबर को हुआ था। इन आंकड़ों से पता चलता है कि विकास की रफ्तार अब भी सुस्त है। साल 1990 से भारत के वर्कफोर्स में हर साल आठ लाख वर्कर्स जुड़ते रहे हैं। श्रम मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट से पता चलता है कि संगठित क्षेत्र 50 फीसदी नए वर्करों को ही नौकरियां दे पाता है। गौरतलब है कि 10 या 10 से ज्यादा कर्मचारियों वाले संस्थानों को ही संगठित क्षेत्र का दर्जा दिया गया है। 2013-14 की आर्थिक जनगणना के मुताबिक, कुल पांच करोड़ 85 लाख संस्थानों में सिर्फ 1.4 फीसदी ही संगठित क्षेत्र का हिस्सा हैं।

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नोटबंदी के असर से मुक्त नहीं हो सकी अर्थव्यवस्था

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि 2016-17 में पैदा नई नौकरियों के कुल अवसरों में 47.4 फीसदी यानी करीब आधे विर्निमाण सेक्टर से आए थे। इनमें शिक्षा और स्वास्थ्य का 32 फीसदी योगदान रहा है। क्षेत्र के आधार पर आए बदलावों के विश्लेषण से पता चलता है कि हेल्थ सेक्टर में रोजगार के अवसरों का अच्छा-खासा विस्तार हुआ है और इस सेक्टर में अप्रैल 2016 के मुकाबले अप्रैल 2017 में 5.5 फीसदी ज्यादा लोगों को नौकरियां मिलीं। स्वास्थ्य के बाद व्यापार, परिवहन, और आईटी/बीपीओ का नंबर आता है। इन तीनों सेक्टरों में 3-3 प्रतिशत की दर से नौकरियों का विस्तार हुआ। कुल मिलाकर अप्रैल 2017 में इन चार सेक्टरों ने मिलकर 21.3 फीसदी नए रोजगार दिए।

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इसके उलट कंस्ट्रक्शन और रेस्ट्रॉन्ट इंडस्ट्री में क्रमशः 6.3 फीसदी और 0.5 फीसदी की गिरावट देखी गई। वित्त वर्ष 2016-17 में नए रोजगार पाने वाले 87 फीसदी लोगों को किसी-न-किसी एंप्लॉयर ने नौकरी पर रखा, जबकि सिर्फ 12.7 फीसदी लोगों ने ही स्वरोजगार की शुरुआत की। यहां भारी तादाद में लोगों को आंशिक रोजगार मिले हैं, जिन्हें बेरोजगार नहीं माना जाता। देश की बड़ी आबादी जिनके पास कोई रेग्युलर जॉब नहीं है और न ही उन्हें कोई अनएंप्लॉयमेंट बेनेफिट मिल रहा है, उन्हें सेल्फ-एंप्लॉयड माना जाता है, जबकि हकीकत में ये मुश्किल से ही जीवनयापन कर पा रहे हैं।

इस संदर्भ में स्वरोजगार की जगह पर किसी-न-किसी एंप्लॉयर से मिली नौकरियां सकारात्मक संदेश देती हैं। इस रिपोर्ट के लिंग आधारित विश्लेषण से पता चलता है कि पुरुषों ने 60.8 फीसदी नई नौकरियों पर कब्जा जमाया, जबकि महिलाएं रोजगार के सिर्फ 39.2 फीसदी नए मौकों को ही अपने नाम कर सकीं।

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Author: Vineet Verma

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