‘मैकेनिकल काऊ’ का कमाल, सात दिन में जैविक खाद तैयार

बरेली : भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आइवीआरआइ) ने आइआइआटी रुड़की के इंजीनियरों की मदद से ‘मैकेनिकल काऊ’ ईजाद की है। संस्थान का यह आविष्कार किसानों के लिए खासा लाभकारी साबित हो रहा है। पहले जैविक खाद बनाने में किसानों को परंपरागत तरीके से साल भर लग जाता था। अब मैकेनिकल काऊ यानी कंपोस्टिंग मशीन महज सात दिन में यह काम पूरा कर देती है। इसी खूबी के चलते तमाम कंपनियों ने आइवीआरआइ के वैज्ञानिक और मैकेनिकल काऊ कॉन्सेप्ट के जनक डॉ.रणवीर सिंह से संपर्क साधा है। लखनऊ, दिल्ली समेत तमाम जिलों से सरकारी और गैर सरकारी कंपनियां आइवीआरआइ पहुंच रही हैं।

गाय के पेट जैसी संरचना से दिया नाम

मैकेनिकल काऊ दरअसल एक कंपोस्टिंग मशीन है। इसका नाम गाय के बाहरी शरीर नहीं बल्कि उसके पाचन तंत्र के नाम पर रखा है। गाय की तरह ही मशीन में सूक्ष्मजीवी खरपतवार जैसे सूखी पत्तियां, बचा भोजन, गोबर या आदि को खाद में तब्दील करने के गुर हैं।


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शुरुआत में लगते हैं चालीस दिन

मैकेनिकल काऊ कंपोस्टिंग मशीन ईजाद करने वाले डॉ.रणवीर सिंह बताते हैं कि पहली बार मशीन खाद बनाने में करीब चालीस दिन लगाती है। यह समय रोटरी ड्रम में सूक्ष्मजीवी विकसित होने की वजह से लगता है। इसके बाद रूटीन प्रक्रिया होने के बाद सूक्ष्मजीवी विकसित होते रहते हैं।

70 डिग्री तापमान और चंद मिनट की मेहनत

मैकेनिकल काऊ के अंदर रोटरी में तापमान 70 डिग्री तक होता है। उसे तीन से चार मिनट तक घुमाया जाता है। इससे कूड़ा-कचरा ऑक्सीजन और सूक्ष्मजीवों के संपर्क में आ जाता है। हर दिन 120 किलो कचरा डालकर रोजाना 100 किलो जैविक खाद निकाली जा सकती है।

किसानों के लिए छोटी मशीन की भी कवायद

डॉ.रणवीर सिंह बताते हैं कि जैविक खाद में कुल 2.6 फीसद नाइट्रोजन और छह ग्राम प्रति किलो फास्फोरस मिलता है। किसानों को सीधे लाभ पहुंचाने के लिए अब छोटी मशीन बनाने पर विचार है। वर्जन

मैकेनिकल काऊ किसानों को जैविक खेती की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए क्रांतिकारी कदम है। विभिन्न कंपनियां मशीन को लेकर रूचि ले रही हैं।

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Author: Web_Wing

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