मामूली धैर्य और आगे-पीछे सैकड़ों लड़के-लड़कियाँ

दिनेश पाठक


हाल के दिनों में वर्कशॉप के सिलसिले में मेरी मुलाकातें टीचर्स से हुईं। काम की बातों के बीच कमोवेश सबकी चिंता यह थी कि आजकल स्टूडेंट्स बहुत कम उम्र में प्यार के चक्कर में पड़ रहे हैं। कुछ का यह भी कहना था कि जितना जल्दी इन्हें प्यार हो रहा है, उससे तेज ब्रेकअप की खबरें आम हैं। शिक्षकों की इस बात से इनकार करना नादानी होगी। क्योंकि वे इन समस्याओं से रोज रूबरू हो रहे हैं।

मैं इन तथ्यों के मद्देनजर कुछ बातें बच्चों से जरूर कहना चाहूँगा। प्यार-व्यार के चक्कर में पड़ने का समय अभी नहीं है। आप अभी किसी एक लड़की या लड़के के चक्कर में पड़कर अपना, उसका, स्कूल, परिवार, सबका नाम खराब कर रहे हो। असल में आप बहुत योग्य हो। अगर धैर्य पूर्वक अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए अभी किताबों से प्यार कर लोगे तो भरोसा करो आगे आपके सामने हजारों लड़के-लड़कियाँ लाइन लगाएंगे और आप तय करोगे कि किसे जीवन साथी बनाना है। यह तभी सम्भव है जब आपकी पढ़ाई ठीक से होगी। अच्छी तैयारी के सहारे ही आप का कॅरिअर मुकाम तक पहुँचेगा। मेरे एक दोस्त हैं। उनका बेटा स्कूल के दिनों से ही बड़ा दबा-कुचला सा रहता था। वे कई बार चिंतित भी रहते थे। जब भी हम मिलते वे बेटे की बुराई लेकर बैठ जाते। भाभी तो उस बेचारे को कोसने में लगी रहतीं। कहतीं, यह पढ़ लिख भी लेगा तो भी इसे कौन लड़की पसंद करेगी। इतना चुप्पा जो है।

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समय बीता। इस नौजवान ने वह कर दिखाया, जो उसके पैरेंट्स भी नहीं सोचते थे। उसके इसी मिजाज की वजह से उसे हर आदमी अंडर एस्टीमेट करता था। पर, अब पड़ोसी भी उस पर गौरव कर रहे हैं। मम्मी डैडी तो खैर कर ही रहे हैं। अब तो लोग यह भी कहने लगे हैं कि मैं तो शुरू से ही कहता था / कहती थी कि यह छुपे रुस्तम है आदि-आदि। इस समय यह नौजवान सिविल सर्विसेज के जरिए भारत सरकार की सेवा में चयनित हो चुका है। अब उसके घर पर शादी वाले लाइन लगाए हुए हैं। जो मम्मी इसी चिंता में डूबी हुई थीं कि उन्हें बहू नहीं मिलेगी, आज वही मम्मी दिन भर फोटो निहार रही हैं। कंफ्यूज हैं किसे पसंद करें और किसे ख़ारिज।

एक और सच्ची कहानी है। यह कहानी एक बेटी की है। वह सेना में अफसर बन गई। अब वे लोग भी उसे अपनी बहू बनाने में रुचि रखने लगे, जो बात भी करना पसंद नहीं करते थे। असल में सेना में अफसर बनी यह बिटिया पहले बहुत साधारण सी दिखती थी। पढ़ने में होशियार थी। न काहू से लेना देना, न काहू से दोस्ती। घर से स्कूल, कॉलेज। मां की रसोई में मदद भी करती और तैयारी भी। अब उसका हुलिया बदल गया तो यहाँ भी वही हाल है, जो वहाँ है।

कहने का मतलब यह है कि स्कूल, कॉलेज का प्यार केवल क्षणिक सुख के लिए ही है। अगर आप चाहते हो कि अपने लिए दूल्हा या दुल्हन का चयन आप खुद करो तो धैर्य से पहले पढ़ाई पूरी करो। कॅरियर बनाओ। फिर देखिए, दुनिया कैसे आपको हाथोंहाथ लेगी। जो लोग अपने बेटी या बेटे के साथ देखते ही गुस्से से आग बबूला होते हैं न, वे ही अपनी बेटी-बेटे के लिए आपकी ओर ललचाई नजरों से देखते हैं। क्षणिक सुख को छोड़ ध्यान पढ़ाई में लगाइए और स्थाई सुख पाने की योग्यता हासिल करने का समय है।

स्कूल, कॉलेज के छात्र-छात्राओं संभल कर जीवन में बढ़ो आगे। दोनों कहानियाँ सच पर आधारित हैं। पैरेन्ट्स से अनुरोध कि अपने लाडले-लाडली से इस मसले पर स्पष्ट बात करें, न कि आगे-पीछे से नजर रखें। खुली बात हमेशा फायदे का सौदा साबित होगी।

(लेखक मोटीवेशनल स्पीकर हैं। पैरेंटिंग पर उनकी तीन किताबें हैं। एक किताब पर उत्तर प्रदेश दूरदर्शन ने धारावाहिक तैयार किया है। आप छात्रों, पैरेंट्स और टीचर्स के साथ संवाद करते रहते हैं)

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Author: Indian Letter

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