बच्चे मन के सच्चे: जब जागो तभी सबेरा, अभी कुछ भी बिगड़ा नहीं

दिनेश पाठक


लखनऊ के एक प्रतिष्ठित स्कूल में मासूम ने अपने से छोटे मासूम को बाथरूम में बंद कर केवल इसलिए चाकू से गोदा कि स्कूल कुछ दिन के लिए बंद हो जाएगा। अभी शुरुआती कारण यही सामने आया है। सम्भव है कोई और बात भी हो। लेकिन तय है कि हमले की आरोपी मासूम कोई बहुत बड़ी योजना बनाकर तो ऐसी घटना को अंजाम नहीं देगी।

उसने इस घटना को एसेम्बली के बाद अंजाम दिया। वह सब्जी वाला चाकू लेकर आई थी। इस वारदात के बाद स्कूल में बवाल मचा हुआ है। थाना, पुलिस सब हो गया। मैनेजमेंट के लोग गिरफ्तार कर लिए गए। खैर, कानून अपना काम करेगा ही। लेकिन इस घटना के मूल में जो बात मुझे समझ आती है, वह लालन-पालन में हमसे हो रही चूक है। और यह चूक केवल आरोपी पैरेन्ट्स से नहीं हो रही है। ज्यादातर पैरेन्ट्स यह गलतियाँ लगातार कर रहे हैं। इस लेख को पढ़ते हुए दिल पर हाथ रखकर पूछिए कि पिछली दफा आपने अपने बच्चे के साथ मस्ती कब की थी। ज्यादातर केस में जवाब होगा, याद नहीं। क्योंकि हमारे पास अब समय नहीं है, बड़ी व्यस्तता है, दफ़्तर में बॉस ने उलझा कर रखा है, व्यापार में बहुत उलझनें हैं…जैसे दर्जनों बहाने।

बाथरूम


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हम यह भूल जा रहे हैं कि हमारे बच्चे अपने सवाल किससे पूछे? मम्मी, डैडी ही तो उनके अंतिम सहारा हैं। दादा-दादी, नाना-नानी युग खत्म हो गया। पाश्चात्य संस्कृति ने हमें जकड़ सा लिया है। जरूरतें हमारी इतनी बढ़ गई हैं कि घर से दूर जाने की हम सबकी या यूं कहिए कि ज्यादातर लोगों की मजबूरी है। इस वजह से बच्चे अकेले पड़ जा रहे हैं। ऊपर से टीवी, इंटरनेट, फोन का युग। अब इस युग पर पर्दा तो डाला नहीं जा सकता। हमें इसी के साथ जीना है। इन सुविधाओं के सकारात्मक पहलुओं पर नजर डालते हुए इसका लाभ लेना है। ऐसे में समय का बहुत महत्व है। दाल-रोटी के चक्कर में उलझे मम्मी-डैडी अपने मासूम को कितना समय दे रहे हैं? शायद बहुत कम या न के बराबर।

ज्यादातर मामलों में बच्चे स्कूल जा रहे होते हैं, तब उनकी मुलाकात पापा से होती है, वह भी नींद में। शाम को देर से आना अब हमारी फितरत में शामिल है। बच्चे स्कूल से लौटे तो मम्मी मिलीं, जिन्होंने कुछ खिलाने का यत्न किया और पूरा प्रयास यही होता है कि मासूम आराम कर ले। शाम को बच्चे को मोहल्ले में जाना ही है। खेलकूद भी जीवन का जरूरी हिस्सा है। यद्यपि, ऐसे बच्चे कम हैं। ज्यादातर मौका मिलते ही टीवी, इंटरनेट की शरण में पहुँचे। मोबाइल हाथ में लिए और कल्पनाशीलता के आधार पर बने गेम में उलझकर रह जा रहे हैं। उस आभासी गेम को जीतने के चक्कर में वे जीवन का असल गेम भूल जा रहे हैं। और पैरेन्ट्स एन-केन-प्रकारेण घर में सिर्फ शांति चाहते हैं। उन्हें इस बात की चिंता भी शायद नहीं है कि इस शांति के पीछे अशांति छिपी है।

हमें ध्यान रखना होगा कि यह भारत देश है, जिसकी जड़ों में यहाँ की संस्कृति है। हम यूरोपियन कंट्रीज से अपनी तुलना नहीं कर सकते। अच्छी चीजें कहीं से भी सीखने में कोई बुराई नहीं है लेकिन अच्छे-बुरे का फर्क तो करना ही होगा। मैं बार-बार कहता-लिखता आ रहा हूँ कि बच्चे (7-14 वर्ष) शुरुआती दिनों में खूब सवाल करते हैं। अगर इनके जवाब पैरेन्ट्स ने दिये तो ठीक अन्यथा सवालों के जवाब वो तलाशने के लिए किसी भी स्तर तक जाएंगे। टीचर्स, वैन ड्राइवर, पार्क वाले अंकल…। अब इस बात की गारण्टी कौन लेगा कि ये सारे अंकल सही जवाब दे रहे हैं। टीचर्स, पैरेन्ट्स के मामले में तो गारंटी है।

अब जरा सोचिए कि बच्चा अपने जवाब का भूखा है, तो उसकी भूख मिटाने की जिम्मेदारी किसकी है? बुजुर्ग कहते हैं कि भूख लगी हो, तो सूखी रोटी भी अच्छी लगती है, पेट भरा हो तो पकवान में भी स्वाद नहीं आता। कुछ ऐसी ही स्थितियाँ हैं हमारे बच्चों की। असल में अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाना होगा मासूम को समय देना। यह काम उतना ही जरूरी है, जितना ब्रश, स्नान, नाश्ता और भोजन। रोज उनसे इतनी आत्मीयता दिखानी होगी, जिससे उन्हें भरोसा हो जाए कि मेरी हर समस्या का निदान यहीं है। मम्मी-डैडी के पास।

अगर कोई गलत सवाल भी बच्चा पूछे तो भी संजीदगी से ही जवाब देना होगा। हमें किसी भी सवाल का सामना करने को खुद को तैयार रखना होगा। कारण, टीवी, इंटरनेट ने दुनिया को खोलकर रख दिया है। कुछ भी छिपा नहीं है। जिसे आप छिपा मानते हो, वह भी खुले में उपलब्ध है। फर्क सिर्फ इतना हो सकता है कि हमें इसकी जानकारी नहीं है। अगर ऐसा न होता तो दिल्ली में चार साल के बच्चे के खिलाफ रेप का मुकदमा तो न दर्ज होता। इस बात से तो आप भी सहमत हो सकते हैं कि चार साल की उम्र फिजिकली, मेंटली, सेक्स के लिए तो नहीं है। पर, कोशिश कभी भी हो सकती है। कोई भी कर सकता है। तो समय सावधान होने का है। युग को हम नहीं कोस सकते। मासूम को नहीं कोस सकते। खुद को कोसने का मौका आने से जरूर रोक सकते हैं। तमाम सावधानियों के बाद भी हम यह नहीं कह सकते कि सब कुछ ठीक होगा। पर, हम अपना बेस्ट तो दे ही सकते हैं।

तो देर अभी भी नहीं हुई है। बुजुर्गों ने कहा है न, जब जागो तबै भिनुसार। मतलब, जब जागो, तभी सबेरा।

(लेखक भावी पीढ़ी पर केंद्रित अभियान ‘बस थोड़ा सा’ के संयोजक हैं। आप छात्रों, पैरेंट्स और टीचर्स से संवाद बनाए हुए हैं।)
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Author: Vatsaly

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