बच्चे मन के सच्चे: कितना समय देते हैं आप अपने मासूम को

 

दिनेश पाठक


इटावा में एक मासूम पिता की शिकायत करने इसलिए कोतवाली पहुँच गया क्योंकि वे उसे शहर में लगी नुमाइश दिखाने नहीं ले गए। जब यह बच्चा कोतवाली पहुँचा तो पुलिस भौचक। करे तो क्या करे। पुलिस ने पिता को बुलाकर डाँट भी लगाई और उस बच्चे के अलावा कुछ और गरीब बच्चों को नुमाइश दिखाकर अच्छे वाले पुलिस अंकल भी बन गए।

इस बीच मासूम का वीडियो वायरल हो गया। जो बातें उसने अपने पिता के बारे में कही है, वह सभी पैरेंट्स के लिए हो सकती है। यह कहानी केवल उस मासूम की नहीं, बहुतेरे की है।


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उसने कहा कि मेरे पापा दुकान बंद करके दिन दिन भर गायब रहते हैं। मम्मी कुछ कहती है तो उनसे भी लड़ाई करते हैं। उसने जब नुमाइश दिखाने की बात की तो डाँटने लगे। धमकी दी तो बोले-जो करना हो कर लो। इसलिए मैं पुलिस के पास आ गया। इस मासूम की सिर्फ इतनी इच्छा है कि पुलिस उसके पापा को डाँट लगा दे। न माने तो पिटाई कर दे लेकिन वही मासूम यह भी कहता है कि मेरे पापा अच्छे हैं लेकिन जब गुस्सा करते हैं तभी गड़बड़ हो जाते हैं।

मैं वर्षों से यह कहता आ रहा हूँ कि पैरेंट्स को अपने बेटे-बेटी को समय देना पड़ेगा। जो समय आज देंगे, उसे निवेश मानें। जितना बढ़िया इन्वेस्टमेंट, उतना बढ़िया परिणाम। हर पैरेंट्स को अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी से कुछ समय हर हाल में निकालना होगा और अपनी संतान को देना होगा। मम्मी को भी और पापा को भी। असल में मासूस को दोनों का प्यार चाहिए। किसी एक से उसका काम नहीं चलता। अगर आप को लगता है कि मम्मी, पापा के बदले आया का समय काम आएगा तो मुगालते में हैं। असल में उसे तो दादा-दादी, नाना-नानी का भी प्यार चाहिए, पर यह तो हर किसी के नसीब में है नहीं। और होगा भी कैसे, जब बेटा अपनी बुजुर्ग मां को घर से बाहर निकाल देगा तो भला मासूम को इस अमूल्य प्यार से तो महरूम ही रहना होगा। कॅरियर के चक्कर में आजकल नई बहुएं भी भाग रही हैं। पति-पत्नी, दोनों के कॅरियर की वजह से संतानों का वाजिब हक उन्हें नहीं मिल पा रहा है।

आया आपकी मदद तो कर सकती है लेकिन मासूस को मां का पूरा प्यार नहीं दे सकती। मेरी बात पर भरोसा नहीं है तो कुछ उदाहरण दे रहा हूँ। इसे आजमाइए। बच्चा जब किसी की गोद में रो रहा हो तो उसे उठाइये और मां की गोद में दे दीजिए। देखिए, माँ जैसे ही गले लगाकर पीठ पर प्यार की थपकी देगी, मासूम के सभी दुःख कम हो जाते हैं। वह चुप हो जाता है। इसे एक नहीं, अनेक बार आप आजमा सकते हैं। हर बार यह फार्मूला कारगर साबित होगा। एक ही सूरत में यह फेल होगा, जब मासूम को ज्यादा तकलीफ होगी और वह बता भी नहीं पाएगा। बच्चे के ऐसे सभी दुःख माँ आसानी से पकड़ लेती है।

मासूम

इसका मतलब मैं लड़कियों के कॅरियर का बिल्कुल विरोध नहीं कर रहा हूँ। लेकिन यह सुझाव जरूर देना चाहता हूँ कि जब भी बेबी प्लान करें तो पति-पत्नी एक साथ बैठें और सोचें कि अगर दोनों का अपना कॅरियर चलते रहने देना है तो क्या विकल्प हो सकता है। एक महत्वपूर्ण विकल्प बच्चे की दादी या नानी हो सकते हैं। इन् दोनों रिश्तों में से किसी को आप अपने पास रोक सकते हैं तो यह फायदे की बात होगी। लेकिन उन्हें यह नहीं लगना चाहिए कि आपने उन्हें इस्तेमाल करने के लिए बुलाया है। उन्हें इस बात का एहसास कराना होगा कि वे आपके जीवन का अहम हिस्सा हैं। दादी, नानी को रखने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि आप आया नहीं रखिए। जरूर रखिए। इससे उन्हें लगेगा कि आप उनका भी ख्याल रखते हो। इसके दो सीधे फायदे होंगे। एक-आपके बच्चे की पूरी सुरक्षा होगी। दो-समाज भी आपको अच्छी नजर से देखेगा क्योंकि आप अपनी माँ को उसका वाजिब हक दोगे। अगर कोई ऐसा तालमेल बन पाए कि दादा-दादी या नाना-नानी, बारी बारी चारों का प्यार इस बच्चे को मिले तो सोने पर सुहागा। पर, यह सब एक दिन में नहीं होगा। बेबी प्लान करने से पहले ही यह बातचीत करनी होगी। बल्कि, माँ और सासू माँ को भी इस प्लान का हिस्सा बनाएं। उन्हें भी अच्छा लगेगा और वे दोनों मानसिक रूप से तैयार भी रहेंगे। ऐसा हुआ तो इटावा की घटना दोहराई नहीं जाएगी। आमीन

(लेखक भावी पीढ़ी पर केंद्रित अभियान ‘बस थोड़ा सा’ के संयोजक हैं। आप छात्रों, पैरेंट्स और टीचर्स से संवाद बनाए हुए हैं।)
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Author: Vatsaly

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1 Comment

  1. Very good and practical approach has been discussed.The writer has indepth knowledge of human and child psychology both.

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