नए साल की बधाई और पाण्डेय जी

दिनेश पाठक


लो जी नया साल आया और पुराना भी हो गया। लोगों में बधाई देने की ऐसी होड़ कि एक ही संदेश तीन-तीन बार अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर पेस्ट किए जा रहे थे।

31 दिसम्बर की देर रात नए साल का स्वागत करने के चक्कर में जगराता हुआ, फिर पाण्डेय जी सोने चले गए। बिस्तर में पड़े ही थे कि फोन से अलग-अलग तरह की आवाजें आने लगीं। पाण्डेय जी उठे गुस्से में और फोन बंद कर दिए। आराम से उठे एक जनवरी की सुबह। आदतन फोन हाथ में लिए। उसे खोला। तड़ तड़ संदेशे गिरने लगे। पाण्डेय जी को लगा कि जवाब दे देना चाहिए। बिना मुँह, हाथ धोए शुरू हो गए। शुभकामनाओं के जवाब देने में ऐसे उलझे कि बहुत कुछ भूल गए। भाभी जी को भी। उन्हें नया साल मुबारक तक बोलने की फुर्सत नहीं निकाल पाए, जो पूरे साल उनका केवल ख्याल रखती हैं।

बधाई


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पाण्डेय जी को व्यस्त देख भाभी जी को लगा कि कोई दफ़्तर का जरूरी काम निपटा रहे होंगे। बिना चर्चा के भाभी जी खुद ही चाय बनाने लगीं। वैसे यह काम ज्यादातर सुबह पाण्डेय जी ही करते हैं। चाय लेकर भाभी जी पाण्डेय जी के पास पहुँची, लेकिन वे तो अपने में ही मगन थे। बड़बड़ाते हुए कुछ ऐसा कह रहे थे, जो भाभी जी को बुरा लगा। वैसे भाभी जी को पहले तो यह बुरा लगा कि दुनिया भर में प्यार बाँटने वाले पाण्डेय जी ने उन्हें देखकर साल की पहली सुबह मुस्कुराए भी नहीं। हैप्पी न्यू ईयर बोलना तो दूर की बात। अब जब भाभी चाय लेकर खड़ी हो गईं सामने, तब भी पाण्डेय जी का ध्यान उनकी ओर नहीं गया। पाण्डेय जी दफ़्तर वाली पूनम, सोनम को जवाब भी दे रहे थे और बड़बड़ा भी रहे थे। पता नहीं आजकल की महिलाओं को क्या हो गया है? एसएमएस किया, व्हाट्सएप पर भी शुभकामना संदेश लिखा। अब मैसेंजर पर जवाब देकर फुर्सत ही पाए थे कि फेसबुक पर भी अवतरित हो गईं।

पाण्डेय जी की हरकतों पर नजर रखते हुए ट्रे में मौजूद चाय ठंडी हो गई। अब भाभी जी का गुस्सा आसमान पर था लेकिन उन्होंने जाहिर नहीं किया। जाकर रजाई में पड़ गईं। 11 बजे होंगे, पाण्डेय जी ने देखा घर में कोई हलचल नहीं। बच्चे पहले से ही पुणे में हैं। बैडरूम में पहुंचे। भाभी जी का हाल जानने का प्रयास कर ही रहे थे कि वो फट पड़ीं। साल के पहले ही दिन भाभी जी का गुस्सा पाण्डेय जी के ऊपर से गुजर रहा था लेकिन वे मनाने के प्रयास में कोई कमी नहीं छोड़ रहे थे। फिर भाभी जी ने पूरा किस्सा बयाँ किया कि कैसे पाण्डेय जी चाय पिलाना भूल गए। कैसे उनकी बनाई चाय ठण्डी हो गई। किस तरह पाण्डेय जी पूनम, सोनम में उलझे रहे और सामने खड़ी भाभी जी की ओर ध्यान ही नहीं दिया। बोलीं-नया साल पर आए संदेश का जवाब दो लेकिन इसी दुनिया में रहकर। सुबह बच्चों को फोन तक नहीं किया। बीवी की ओर देखा तक नहीं। मोहल्ले में भी नहीं निकले। अरे भाई, कोई दुःख, तकलीफ होगी तो ये आभासी दुनिया काम आएगी या फिर मोहल्ले और घर के लोग। भाभी जी ने अपनी बात पर बल देकर कहा कि मित्रों शुक्ला जी, श्रीवास्तव जी, मिताली जी, और वो क्या नाम, अरे हाँ, शिंदे जी से रात में ही बात हो गई। बच्चों का फोन जरूर नहीं उठा। फिर सुबह-सुबह सारा कामकाज छोड़कर पूनम, सोनम जैसों के चक्कर में अपना समय बर्बाद करना कौन सी होशियारी है।

पाण्डेय जी को सारा माजरा समझ आ गया। वे बोले भाग्यवान! अब चुप भी करो। गुस्सा थूक दो। चलो, इस गलती को माफ भी करो। अगली बार रखेंगे ध्यान। अब तो गलती हो चुकी है। भाभी जी बोलीं-ध्यान रखना। रिश्ते जमीनी बनाओ। आभासी दुनिया के रिश्तों में कोई दम नहीं होता। अपने, अपनों, पड़ोसियों, मोहल्ले वालों से रिश्ते ठीक होंगे तो पूरी दुनिया जीत लोगे। खुशी भी यही लोग मनाएंगे और दुखी भी यही लोग। भाभी जी फिर बोलीं, मैं आभासी दुनिया की विरोधी नहीं हूँ। इसका इस्तेमाल अपने ज्ञान का स्तर बढ़ाने में लगाओ। उसका इस्तेमाल तरक्की में करो। समझे कि नहीं। साल का पहला दिन और पहली सुबह खराब कर दी। 55 पार कर चुके पाण्डेय जी अब समझ चुके थे। बोले-भाग्यवान, माफी दे दो। आगे से ध्यान रखेंगे। चलो गरमा-गरम चाय पीते है। बना ली है। तुम्हारी ठण्डी हो गई थी, मेरी भी हो जाएगी। चाय की चुस्कियाँ लेते हुए दोनों ने ठहाका लगाया और जुट गए दिनचर्या में।

 

(लेखक मोटीवेशनल स्पीकर हैं। पैरेंटिंग पर उनकी तीन किताबें हैं। एक किताब पर उत्तर प्रदेश दूरदर्शन ने धारावाहिक तैयार किया है। आप छात्रों, पैरेंट्स और टीचर्स के साथ संवाद करते रहते हैं)

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Author: Indian Letter

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