जगाइए अपना जमीर… पुकार रहा कश्मीर…

आज आपको याद न रहा होगा लेकिन कश्मीरी पंडित जहां भी हैं, आज का दिन भूल नहीं सकते…! 28 साल पहले 19 जनवरी 1990 को कश्मीरियत की सरेआम हत्या की गई थी…। इन हत्याओं को सत्ता ने संरक्षण तब भी दिया था, आज भी दे रखा है। लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ इस दर्द को महसूस करने के लिए रहा है नहीं, मर चुका है; और न्याय तंत्र अपनी आत्मा गिरवी रख चुका है। जो न्यायाधीश मनचाहे केस नहीं मिलने पर आज यह कहकर प्रेस कांफ्रेंस करते हैं कि आने वाले वर्षों में कोई यह न कहे कि हमने बेच दी है अपनी आत्मा… वे भी यह केस नहीं खोलते, इस पर कुछ नहीं बोलते क्योंकि इस मुद्दे पर लोकतंत्र के हर स्तम्भ ने बहुत पहले बेच दी है अपनी आत्मा…।

कश्मीरी पंडित

शायद आपको, किसी को अब कुछ याद नहीं कि आज के दिन क्या-क्या हुआ लेकिन कश्मीरी पंडित जहां भी हैं, आज का दिन नहीं भूल सकते…। आज हम कहते हैं कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता लेकिन आज ही के दिन कश्मीर में रहने वाले तमाम मुसलमानों का आतंक ही एकमात्र धर्म बन गया था और हम चुप रहे…। आज दुनिया में आईएस पर कोहराम मचा है लेकिन अपने ही देश में आज के दिन कश्मीर इस्लामिक स्टेट बन गया और हम चुप रहे…। आज कहीं किस एक धर्म-जाति के किसी शख्स की हत्या होती है और हम उबल पड़ते हैं लेकिन आज के दिन धर्म के नाम पर हजारों हत्याएं की गईं लेकिन हम चुप रहे… किसी ने न रोका, न टोका बल्कि सरकारी, संवैधानिक संरक्षण दिया गया इस जुल्म को…। आज हम दूर किसी देश से आए रोहिंग्या को शरण देने के लिए मचल उठते हैं लेकिन आज ही के दिन हजारों कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थी बन गए और हम चुप रहे; किसी को कोई फर्क न पड़ा…। आज कहीं एक रेप होता है और हम रो पड़ते हैं लेकिन आज ही के दिन हमारे माँ-बहनों की सरेआम बोली लगी कश्मीर में…; मस्जिदों से आवाज दी गई कि पंडितों कश्मीर छोड़ दो और अपनी बीवी-बहनों को हमारे लिए छोड़ दो… लेकिन हम चुप रहे, तब भी जमीर न जगा हमारा। आज हम लोकतंत्र के लिए चिंतित हैं लेकिन सत्ता के दोगलेपन से आज ही के दिन लोकतंत्र की सरेआम हत्या की गई और हम चुप रहे…। आज हर भूमिहीन को भूमि, हर बेघर को घर देने के लिए सब परेशान हैं लेकिन आज ही के दिन पूरे कश्मीर को कश्मीरियों से छीनकर उसे आतंकियों का पनाहगार बना दिया गया और हम चुप रहे…। लेकिन… हम कब तक चुप रहें? नहीं… अब और नहीं! आइए, इतिहास में हुए इस जुल्म का प्रतिकार करें… हर हत्या, हर जुल्म को धर्म से परे जाकर देखें और आतंक के हर रूप का विरोध करें। आइए, आज ही नहीं, हर दिन खड़े हों अन्याय के खिलाफ ताकि सबके साथ हो न्याय। आइए, महसूस करें कश्मीरी शरणार्थियों के दर्द को और आइए उनकी आवाज बन जाएं…। आइए कि हवा में एक साथ बन्द मुट्ठी लहराएं और इस तरह बोलें कि सत्ता डोले… आइए नारा लगाएं कि जिन्हें आतंक चाहिए, वे कहीं और जाएं… कश्मीरी पंडितों को वापस अपना कश्मीर चाहिए…।


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कश्मीर की अनकही कहानी को हमारे कुछ साहसिक मित्र ला रहे हैं सामने। इनके प्रयास से जानिए 5000 वर्ष पुरानी कश्मीरियत को और सुनिए-जानिए कश्मीरी पंडितों के साथ हुई जुल्म की इंतहा की कहानी को…। यह सब देख-सुनकर रो न पड़ें तो कहिएगा…। मित्रों ने अपने इस प्रयास में अपने नाम का जिक्र न करने के लिए कहा है ताकि यह प्रयास सिर्फ उनका, हमारा न माना जाए, हम सबका माना जाए और सबके प्रयास को बराबर सम्मान दिया जा सके…। यह काफी कठिन और साहसिक प्रयास है कश्मीर की हकीकत को आप तक पहुंचाने का, सत्ता के मद में चूर हुक्मरानों को कश्मीरी पंडितों के दर्द का अहसास दिलाने का…। आइए इस प्रयास को अभियान बनाएं और कश्मीरियों को उनका कश्मीर दिलाएं…। कॉपी कीजिए, पेस्ट कीजिए, शेयर कीजिए, सौजन्य में मेरा, मेरे मित्रों का नाम लिखिए या न लिखिए, लेकिन इस हकीकत को जन-जन तक पहुंचाइए…। प्रयासों की इस पहली कड़ी में जानिए कश्मीर की आत्मा- कश्मीरी पंडितों के बारे में, असल कश्मीरियत के बारे में…। नीचे दिया वीडियो देखिए या लिंक पर क्लिक कीजिए। अगली कड़ी के साथ शीघ्र आपके सामने होंगे…। शुभकामनाएं दीजिए!

(क्रमशः)

मृत्युंजय त्रिपाठी की फेसबुक वॉल से साभार

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Author: Vatsaly

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